लाड़ली बहना योजना पर सीएम मोहन यादव का बड़ा बयान, कहा- बहुत महंगी पड़ी
राजधानी भोपाल के रवींद्र भवन में आयोजित 'बुंदेली बौछार' के बुंदेली समागम कार्यक्रम के दौरान मुख्यमंत्री मोहन यादव का एक अलग और मजेदार अंदाज देखने को मिला। मंच पर बुंदेली संस्कृति, युवाओं और रोजगार जैसे गंभीर मुद्दों पर चर्चा चल रही थी, लेकिन छतरपुर की चर्चित बुंदेली कंटेंट क्रिएटर बाल कलाकार बिन्नू रानी के एक तीखे और मासूम सवाल ने पूरे कार्यक्रम का माहौल पूरी तरह से हल्का-फुल्का और खुशनुमा बना दिया।
बिन्नू रानी के सवाल पर सीएम का ठहाका
कार्यक्रम के दौरान बिन्नू रानी ने मुख्यमंत्री से सीधा सवाल करते हुए पूछा कि उन्होंने प्रदेश की 'जिज्जियों' यानी बहनों के लिए तो काफी कुछ किया है, लेकिन अब 'बिन्नुओं' यानी बेटियों के लिए उनका अगला क्या प्लान है? इस मजेदार सवाल को सुनकर मुख्यमंत्री मोहन यादव अपनी हंसी नहीं रोक पाए और मुस्कुराते हुए मजाकिया अंदाज में बोले, ''तुमको मालूम नहीं, लाड़ली बहना ही बहुत महंगी पड़ गई। वैसे यह अंदर की बात है, मुझे क्या मालूम था कि मुख्यमंत्री बनते ही इतनी भारी मार पड़ती है।'' मुख्यमंत्री के इस बेबाक जवाब के बाद पूरा हॉल ठहाकों और तालियों की गड़गड़ाहट से गूंज उठा। इसके बाद सीएम ने बिन्नू रानी को तसल्ली देते हुए कहा कि अभी वह इस योजना के लिए छोटी हैं और थोड़ा बड़ा होने के बाद उन्हें इसका फायदा मिल जाएगा।
लाड़ली बहना योजना की वित्तीय चुनौतियां
संवाद के दौरान मुख्यमंत्री ने लाड़ली बहना योजना का खुलकर जिक्र किया और माना कि मुख्यमंत्री की कुर्सी संभालने के बाद ही उन्हें सरकार की वास्तविक आर्थिक जिम्मेदारियों और चुनौतियों का सही अंदाजा हुआ। इसके बावजूद उन्होंने स्पष्ट किया कि तमाम वित्तीय कठिनाइयों के बावजूद सरकार महिलाओं के हित में बड़े फैसले लेने से कभी पीछे नहीं हटेगी। मुख्यमंत्री ने बताया कि इस कल्याणकारी योजना की शुरुआत शुरुआती दौर में 1000 रुपये प्रतिमाह की राशि से की गई थी, जिसे बढ़ाकर अब 1500 रुपये प्रतिमाह कर दिया गया है। सरकार का मुख्य उद्देश्य प्रदेश की महिलाओं को आर्थिक रूप से स्वावलंबी और मजबूत बनाना है।
योजना के आंकड़े और वर्तमान स्थिति
सरकारी आंकड़ों के अनुसार, सितंबर 2026 तक इस महत्वाकांक्षी योजना का लाभ मध्य प्रदेश की करीब 1.25 करोड़ महिलाओं को मिल रहा है। हालांकि, योजना की शुरुआत यानी वर्ष 2023 के बाद से अब तक पात्रता और अन्य कारणों से सूची से 6.25 लाख से अधिक महिलाओं के नाम हटाए भी जा चुके हैं। इन तमाम आर्थिक और प्रशासनिक फेरबदल के बीच सरकार का जोर महिला सशक्तिकरण पर लगातार बना हुआ है।
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